गुरुकी पहचान क्या है? What is Goru's identity?

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Rajniyadav
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गुरुकी पहचान क्या है? What is Goru's identity?

Post by Rajniyadav » 26 Dec 2018, 13:25

गुरु की महिमा, गुरुकी पहचान क्या है?, गुरु शरीर का नहीँ, तत्त्वका नाम है-इसका क्या तात्पर्य है?, गुरु के बिना गति नहीँ होती, ज्ञान नहीँ होता- यह बात कहाँतक ठीक है?

प्रश्न- गुरुकी पहचान क्या है?

उत्तर- गुरुकी पहचान शिष्य नहीँ कर सकता। जो बड़ा होता है, वहीँ छोटेकी पहचान कर सकता है।छोटा बड़ेकी पहचान क्या करे।फिर भी जिसके संगसे अपनेमेँ दैवी-संपत्ति आये,आस्तिकभाव बढ़े,साधन बढ़े,अपने आचरण सुधरेँ,वह हमारे लिए गुरु है।

प्रश्न- गुरु शरीरका नहीँ,तत्त्वका नाम है-इसका क्या तात्पर्य है?

उत्तर- गुरुके द्वारा जब शिष्यको प्रकाश मिलता है,ज्ञान मिलता है,तभी वह 'गुरु' कहलाता है।अब उसको गुरु मानना,उसका आदर,पूजन करना तो शिष्यका काम है,पर वास्तवमेँ गुरु तत्त्वज्ञान ही हुआ; क्योँकि शिष्यको तत्त्वज्ञान होनेसे ही उसकी 'गुरु' संज्ञा सिद्ध होती है।इसलिए भागवतमेँ कहा गया है कि गुरुमेँ मनुष्यबुद्धि और मनुष्यमेँ गुरुबुद्धि करना अपराध है।सन्त कहते हैँ-

जो तू चेला देह को,देह खेह की खान।
जो तू चेला सबद को,सबद ब्रह्मकर मान।।
अर्थात् शब्दसे ही ज्ञान होता है और गुरु शब्दके द्वारा ही तत्त्वज्ञान कराता है।अतः गुरु परमात्मतत्त्व ही हुआ।

प्रश्न- गुरु के बिना गति नहीँ होती,ज्ञान नहीँ होता- यह बात कहाँतक ठीक है?

उत्तर- यह बात एकदम ठीक है,सच्ची है; परंतु केवल गुरु बनानेसे अथवा गुरु बनने से कल्याण,मुक्ति हो जाय-यह बात ठीक जँचती नहीँ।यदि गुरुके भीतर यह भाव रहता है कि 'मेरा एक संप्रदाय (टोली) बन जाय,मैँ एक बड़ा आदमी बन जाऊँ' आदि और शिष्यका भी यह भाव रहता है कि 'एक चद्दर,एक नारियल और एक रुपया देनेसे मेरा गुरु बन जायगा,गुरु मेरे सब पाप हर लेगा' आदि, तो ऐसे गुरु-शिष्यके संबंधमात्रसे कल्याण नहीँ होता।कारण कि जैसे सांसारिक माता-पिता,भाई-भौजाई,स्त्री-पुत्र का संबंध है,ऐसे ही गुरुका एक और संबंध हो गया!

जिनके दर्शन,स्पर्श,भाषण और चिँतनसे हमारे दुर्गुण-दुराचार दूर होते हैँ,हमे शांति मिलती है,हमारेमेँ दैवी-संपत्ति बिना बुलाये आती है और जिनके वचनोँसे हमारे भीतरकी शंकाएँ दूर हो जाती हैँ, शंकाओँका समाधान हो जाता है,भीतरसे परमात्माकी तरफ गति हो जाती है,पारमार्थिक बातेँ प्रिय लगने लगती हैँ,पारमार्थिक मार्ग ठीक-ठीक दीखने लगता है,ऐसे गुरुसे हमारा कल्याण होता है।यदि ऐसा गुरु (संत) न मिले तो जिनके संगसे हम साधनमेँ लगे रहेँ,हमारी पारमार्थिक रुचि बनी रहे,ऐसे साधकोँसे संबंध जोड़ना चाहिए।परंतु उनसे हमारा संबंध केवल पारमार्थिक होना चाहिए,व्यक्तिगत नहीँ।फिर भगवान ऐसी परिस्थिति,घटना भेजेँगे कि हमेँ वह संबंध छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ेगा और वहाँ हमेँ अच्छे संत मिल जायँगे! वे संत चाहे साधुवेशमेँ हो,चाहे गृहस्थवेशमेँ,उनका संग करनेसे हमेँ विशेष लाभ होगा।तात्पर्य है कि भगवान प्रधानाध्यापककी तरह हैँ; वे समयपर स्वतः कक्षा बदल देते हैँ।अतः हमेँ भगवानपर विश्वास करके रुचिपूर्वक साधनमेँ लग जाना चाहिए।

गीतामेँ भगवानने कहा है कि 'जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैँ,वे सब कुछ जान जाते हैँ'(7.29)।अतः भगवानपर विश्वास और भरोसा रखते हुए साधन-संबंधी,भगवत्संबंधी बातेँ सुननी चाहिए और सत्कर्म,सच्चर्चा,सच्चिँतन करते हुए तथा सबके साथ सद्भाव रखते हुए साधन करना चाहिए।फिर किसी संतसे,किसी शास्त्रसे,किसी घटना आदिसे अचानक परमात्मतत्त्वका बोध जाग्रत हो जायगा।

यदि गुरु मिल गया और ज्ञान नहीँ हुआ तो वास्तव मेँ असली गुरु मिला ही नहीँ।असली गुरू मिल जाय और साधक साधनमेँ तत्पर हो तो ज्ञान हो ही जायगा।यह हो ही नहीँ सकता कि अच्छा साधक हो,असली संत मिल जाय और बोध न हो! एक कहावत है-
पारस केरा गुण किसा,पलट्या नहीँ लोहा।
कै तो निज पारस नहीँ,कै बिच रहा बिछोहा।।
तात्पर्य है कि यदि शिष्य गुरुसे दिल खोलकर सरलतासे मिले,कुछ छिपाकर न रखे तो शिष्यमेँ वह शक्ति प्रकट हो जाती है,जिस शक्तिसे उसका कल्याण हो जाता है।
गुरु-तत्त्व नित्य होता है और वह कहीँ भी किसी घटनासे,किसी परिस्थितिसे,किसी पुस्तकसे,किसी व्यक्ति आदिसे मिल सकता है।अतः गुरुके बिना ज्ञान नहीँ होता-यह बात सच्ची है।

*गुरु की महिमा *
वास्तव मेँ गुरु की महिमा का पूरा वर्णन कोई नहीँ कर सकता । गुरु की महिमा भगवान से भी अधिक है । इसलिये शास्त्रोँ मेँ गुरु की बहुत महिमा आयी है । परंतु वह महिमा सच्चाई की है, दम्भ-पाखण्ड की नहीँ ।। आजकल भी शिष्योँ की अपने गुरु के प्रति जैसी श्रद्धा देखने मेँ आती है, वैसा गुरु स्वयं होता नहीँ । आज कल गुरुओँ मेँ हमारी श्रद्धा नहीँ होती, प्रत्युत उनके चेलोँ मेँ श्रद्धा होती है ! कारण कि चेलोँ मेँ अपने गुरु के प्रति जो श्रद्धा है, वह आदरणीय है ।

शास्त्रोँ मेँ आयी गुरु-महिमा ठीक होते हुए भी वर्तमान मेँ प्रचार के योग्य नहीँ है । कारण कि आजकल दम्भी-पाखण्डी लोग गुरु-महिमा के सहारे अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैँ । इसमेँ कलियुग भी सहायक है; क्योँकि कलियुग अधर्मका मित्र है- 'कलिनाधर्ममित्रेण' (पद्मपुराण, उत्तर॰ 193 । 31) । वास्तव मेँ गुरु-महिमा प्रचार करने के लिये नहीँ है, प्रत्युत धारण करने के लिये है । कोई गुरु खुद ही गुरु-महिमा की बातेँ कहता है, गुरु-महिमा की पुस्तकोँ का प्रचार करता है तो इससे सिद्ध होता है कि उसके मन मेँ गुरु बनने की इच्छा है । जिसके भीतर गुरु बनने की इच्छा होती है, उससे दूसरोँ का भला नहीँ हो सकता । इसलिये मैँ गुरु का निषेध नहीँ करता हूँ, प्रत्युत पाखण्ड का निषेध करता हूँ । गुरु का निषेध तो कोई कर सकता ही नहीँ ।

गुरु की महिमा वास्तवमेँ शिष्य की दृष्टि से है, गुरुकी दृष्टि से नहीँ । एक गुरु की दृष्टि होती है, एक शिष्य की दृष्टि होती है और एक तीसरे आदमी की दृष्टि होती है गुरु की दृष्टि यह होती है कि मैँने कुछ नहीँ किया, प्रत्युत जो स्वतः-स्वाभाविक वास्तविक तत्त्व है, उसकी तरफ शिष्य की दृष्टि करा दी । तात्पर्य हुआ कि मैँने उसी के स्वरुप का उसी को बोध कराया है, अपने पास से उसको कुछ दिया ही नहीँ । चेले की दृष्टि यह होती है कि गुरु ने मेरे को सब कुछ दे दिया । जो कुछ हुआ है, सब गुरु की कृपा से ही हुआ है । तीसरे आदमी की दृष्टि यह होती है कि शिष्य की श्रद्धा से ही उसको तत्त्वबोध हुआ है ।

असली महिमा उस गुरु की है, जिसने गोविन्द से मिला दिया है । जो गोविन्द से तो मिलाता नहीँ, कोरी बातेँ ही करता है, वह गुरु नहीँ होता । ऐसे गुरु की महिमा नकली और केवल दूसरोँ को ठगने के लिये होती है !
(गुरु और शिष्य पुस्तक से )


आप का दिन शुभ हों
रजनी यादव :idea:

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